ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

नेताजी-अनिल 'अनिकेत' व्यंग्यकार, हरदोई l


एक नेताजी मेरे पड़ोस में शान बान से रहते हैं l
जैसे भी हों पर मंचों पर अच्छा अच्छा कहते हैं l
केस चलें बहुतेरे उन पर वे कहते सब झूठे हैं l
ये विपक्ष ने लाद दिये या उनसे हैं जो रुठे हैं l

किसकी है मजाल जो उनसे आँख में आँखें मिला सके l
हिम्मत नहीं किसी की ऐसी उनको पानी पिला सके l
इक त्यौहार पे हमने सोचा मैं खाना खिलवाऊँगा l
देवों से भी बड़े देव का वरद हस्त बन जाऊँगा l

मिन्नत और मनौती करके हमने उनको मना लिया l
की खुद की परवाह नहीं खाने पर उनको बुला लिया l
खा पीकर बोले वे इतनी इज्जत नहीं अकारण है l
आखिर इतनी आव भगत का अनिल कहो क्या कारण है l

डरते डरते बोला हमने तुम बिन और न दूजा है l
नागपंचमी के त्यौहार पे नागनाथ को पूजा है ll

                  अनिल 'अनिकेत' व्यंग्यकार, हरदोई l

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