पेटू राम
{व्यंगात्मक रचना}
पेटू राम पेट के चाड़ी,
खा जाते खूब कच्चे।
जहं भी न्यौता मिलता उनको,
पहुंच जाते सब लेके बच्चे।।
सिर्फ मतलबी भोजन के,भोजन से रखते अनुराग।भोजन भोजन भोजन चाही,खाते रहते माग माग।।
लगे प्रिय रसगुल्ला उनको,
और प्यारी प्यारी मीठी खीर।
गरम कचौड़ी नरम पकौड़ी,
तीखी सब्जी मटर पनीर।।
बूंदिया कई परात छानते,खाते संग संग नीमक भात।औरो लाव औरो लाव,करते रहते खाते बात।।
कई कटोरे पीते दही,
वो चीनी मिलाके संग।
खाते जो देखे उन्हे,
मचल मचल हो जाये दंग।।
खाने बाद नही उठ पाते,बड़ा कठिन हो जाते तंग।करें याद न्योतहरी कारुष,पेटू का भोजन से जंग।।
कलम से ✍
कमलेश कुमार कारुष
मीरजापुरी

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