फर्ज़ अपना अगर निभाता है
फिर ये अहसान क्या जताता है
चोट जब खा के मुस्कुराता है
मान पत्थर भी तब ही पाता है
यूँ पराया ही कर दिया यारा
मुझसे आँसू भी अब छुपाता है
कुछ तो अंदाज है जुदा तेरा
ग़म में भी कहकहे लगाता है
जब भी मुझको नज़र न तू आता
दम ये मेरा निकल ही जाता है
ख़र्च करना न यूँ बिना सोचे
खूब मेहनत से धन कमाता है
छोड़ दे दोस्त कल की अब चिन्ता
रात - दिन फिक्र में बिताता है
✍️श्रीमती रजनी टाटस्कर, भोपाल

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