ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

शब्दों के घाव-नलिनी अग्रवाल

"शब्दों के घाव"

शब्द थे तेरे बहुत कंटीले
इतने गहरे घाव कर गए,
भीतर श्लाघा से बन उतरे
आत्मा लहूलुहान कर गए।

मलहम कोई काम करे ना
ज़ख्म ये मेरे भर न पाए,
कितनी ही तरकीबें कर लीं
टीस मगर ये बढ़ती जाए।

अहंकार है या है ईर्ष्या
या दोनों ही घुले मिले हैं,
अंतरगुत्थी में तू उलझी
शब्दों में विष बीज घुले हैं। 

फिर रूमी का कथन पढ़ा तो
ज्ञान का जैसे दीप जल गया,
मोह के सारे बंधन चटखे,
मन प्रशमित प्रशांत बन गया।

'घाव ही तो वो दरवाजा है
जिससे भीतर जाती ज्योति,
कर्म का खाता बंद करो, और
जड़ लो मन में शांति के मोती।'

कभी मिली किसी राह अगर तू
मुंह मोड़ मुड़ जाऊंगी,
घाव पे डाल के अंतर्दृष्टि
बोझ मुक्त हो जाऊंगी।।।

               - नलिनी अग्रवाल

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