ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

कविता -: कब तक-आलोक अजनबी

कविता -: कब तक

ना जुड़ा है ना टूटा है,  बस दूर-दूरहै।
दरार तो है रिश्ते में  ना की चूर चूर है।।
कितना जुड़े कितना टूटे
कई बार मैं, तो कभी तुम भी रुठे।।

कभी ब्लॉक कभी अनब्लॉक हुए।
ये दिल से खेलने के नए शौक हुए।।
यह खेल कब तक खेलना है???
इक दूजे को कब तक झेलना है।।

चालाकियां नादानियां बन रही है।
ज़ख्म और दर्द की कहानी बन रही।
तुम कहती हो समय का अभाव है।
बिना कीमत खा रही भाव है।
निभाना है तो बताना
ना लगाना कोई बहाना।
ठुकराना है तो भी बता देना
इल्जाम चाहे मुझ पर ही लगा देना।।

टूटा हूं बहुत मैं, जबसे जुड़ा हूं ।
भीड़ में तो होंगे पर अकेलापन नजर आएगा।
तेरा लाखों का फोन भी मुझे ना ढूंढ पाएगा।।

©आलोक अजनबी

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