शीर्षक:- लीला
अनेकों ने फिरकी,
तो बहुतों ने आजमाने की कोशिश की,
किसी ने पागल तो किसी ने जिद्दी,
बताने की कोशिश की ,
सुन्दर तो है,
पर बुद्धि घुटनों में रहती है,
कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष,
सनकी साबित करने की कोशिश की ।
आहत तब भी नहीं मैं,
बेखौफ चलती रही ,
खुद का रास्ता ,
खुद की मंजिल बनाती रही,
जब-जब टूटी कालेपन में ही रोई ,
उजाले में हँसते हुए आँखें हमेशा खोली,
क्या क्या नहीं सुना जीवन में,
पर ,
चुपचाप अपना रास्ता तय करती रही।
दौर की याद ना दिलाओ,
बुरा मंजर बहुत देखा है,
कभी तन्हाई तो कभी ,
रुसवाई रुपरेखा है,
बहुत से पीछे छूट गये,
बहुत तो आगे अभी मिलेंगे ,
ना जाने क्या ,
मेरे प्रभु की लीला है !
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प्रतिभा पाण्डेय "प्रति"
चेन्नई

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