चंदा मामा
सन तेइस का रक्षा बंधन बड़ा सुहाना होगा रे ।
चंदा मामा दूर नहीं अब आना जाना होगा रे।
तैयारी की कई बार ना पहुंचे हैं घर मामा के।
पर इसरो ने ठान लिया हम हैं भांजे मामा के।
विक्रम को तैयार किया वह कफन बांध कर निकल पड़ा
तेइस की तारीख शाम को पहुंच गया घर मामा के।
दांतों तले दबाती उंगली दिखती चीनी काकी हैं
अब धोती वालों के पीछे - पीछे चलना होगा रे।।
चंदा मामा दूर....
पिछली बार गए थे लेकिन सपने चकनाचूर हुए।
एक झलक पाने की खातिर कितने तो उपहास सहे ।
सबकी नजर टिकी हर कोई यही बात बस कहता है
रचने को इतिहास आज तो हिन्द देश के लाल खड़े।
हुआ लैंड जैसे ही विक्रम खुशी पूछिए मत अब तो
छप्पन इंची सीने का रुतबा दुनिया में होगा रे।।
चंदा मामा दूर....
कदम चांद पर रखते ही भारत की जय जयकार हुई ।
इतनी खुशी मिली की धड़कन गति से फिर गतिमान हुई ।
पूनम का अब चांद कहें या चंदा मामा हम इसको
जिसका जैसा भाव रहा मन में वैसी तस्वीर हुई।
प्रकृति की अनुपम कृति हो तुम ऋणी तुम्हारे हम सब है
एहसान बहुत करते हो तुम आभार जताना होगा रे।।
चंदा मामा दूर नहीं अब आना जाना होगा रे।
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©पिंकी अरविन्द प्रजापति
सिधौ सीतापुर उत्तर प्रदेश
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