( मैं गुड़िया एक पराई थी )
अरमान लिए जिस आंगन में
मैं बिटिया बनकर आई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक पराई थी !
हर चेहरे पर दिखी उदासीमायूसी मन में छाई थीजब बड़ी हुई तो पता चलामैं गुड़िया एक पराई थी !
जिस मां ने मुझको जन्म दिया
बैठी थी घिर कर तानों से
हो रहा कलेजा घायल था
कटु व्यंग्य शब्द के बाणों से
पर मां ने सब कुछ सहन किया
बन बैठीं ममतामाई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक .......... !
माथे की लकीरों को सबकेपल्लू से छिपकर झांका थासबने जीवन का बोझ मुझेअपनी नज़रों से आंका थाखुशियों का नाम निशान नहींन लड्डू बालूशाही थीजब बड़ी हुई तो पता चलामैं गुड़िया..............!
बेफिक्र थी मैं कोई फ़िक्र नहीं
जैसे घर की शहजादी हूं
पापा खुश होकर बोले थे
उनके किश्मत की चाबी हूं
न मिला बिछौना मखमल का
ड्योढी में दरी बिछाई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक............!
न सोहर मंगल गीत बजेन हंसी ठिठोली सुन पाईसुन लिया किसी को यह कहतेबिन बोए बिटिया उग आईमांगा था मन्नत बेटे कादस द्वार पूजकर आई थीजब बड़ी हुई तो पता चलामैं गुड़िया एक..........!
पढ़ लिख कर अपने पांव खड़ी
मैं बोझ और अभिषाप रही
खुद में खुद साहस भर भर कर
धरती से अंबर नाप रही
मानवता गहरी नींद में थी
मैं उसे जगाने आई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक...........!
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( संजय श्रीवास्तव अवधी )
मनकापुर , गोंडा
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