ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

मैं गुड़िया एक पराई थी-संजय श्रीवास्तव अवधी

( मैं गुड़िया एक पराई थी )


अरमान लिए जिस आंगन में
मैं बिटिया बनकर आई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक पराई थी !

हर चेहरे पर दिखी उदासी 
 मायूसी मन में छाई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक पराई थी  !

जिस मां ने मुझको जन्म दिया
बैठी थी घिर कर तानों से
हो रहा कलेजा घायल था
कटु व्यंग्य शब्द के बाणों से
पर मां ने सब कुछ सहन किया
बन बैठीं ममतामाई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक .......... !

माथे की लकीरों को सबके
पल्लू से छिपकर झांका था
सबने जीवन का बोझ मुझे
अपनी नज़रों से आंका था
खुशियों का नाम निशान नहीं
न लड्डू बालूशाही थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया..............!

बेफिक्र थी मैं कोई फ़िक्र नहीं
जैसे घर की शहजादी हूं
 पापा खुश होकर बोले थे
उनके किश्मत की चाबी हूं
न मिला बिछौना मखमल का
ड्योढी में दरी बिछाई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक............!

न सोहर मंगल गीत बजे
न हंसी ठिठोली सुन पाई
सुन लिया किसी को यह कहते
बिन बोए बिटिया उग आई
मांगा था मन्नत बेटे का
दस द्वार पूजकर आई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक..........!

पढ़ लिख कर अपने पांव खड़ी
मैं बोझ और अभिषाप रही
खुद में खुद साहस भर भर कर
धरती से अंबर नाप रही
मानवता गहरी नींद में थी
मैं उसे जगाने आई थी
जब बड़ी हुई तो पता चला
मैं गुड़िया एक...........!


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( संजय श्रीवास्तव अवधी )
 मनकापुर , गोंडा
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