बचपन के अनोखे पल
सोच सोच करता हूं यादें कितना बचपन का पल पावन।
अक्का बक्का तीन तिलक्का खेल था कितना भावन।।
सोर्रा पत्ती खेल निराले,
लुका छिपी औ कौड़ी।
घुड़ पछाड़ कबड्डी खूबे,
ओ साथ में दौड़ा दौड़ी।।
चांई मांई चुन्नी रानी थी बड़ी मनोरम में ओ सावन।
सोच सोच करता हूं•••••••••••••••••।
कोदौ सांभा वाला भतवा,
मिला मिला सरपोटते मठ्ठा।
ज्वार बाजरा भी खाते थे,
भूंजा भूंजा अंगिठिया भठ्ठा।।
धनिया नमक मिर्च पिसाला होता ज्वार के सत्तू खावन।
सोच सोच करता हूं•••••••••••••••••।
दोहनी के पाकल दूधवा,
औरी मोटी मोटी साढ़ी।
बड़े चाव से खा जाते थे,
कोरुनी सुतुई से काढ़ी।।
ओ बासी जोधरी वाली रोटिया भाजी चना में छावन।
सोच सोच करता हूं•••••••••••••••••।
नदिया नाला खूब नहाते,
खेलि खेलि पन छूतिया।
आके घरवा खूब पीटते,
बनाके चेहरा भूतिया।।
ओ रेहन खूब बटोरते खेतवा कपड़े साफ करावन।
सोच सोच करता हूं••••••••••••••••।
कागज नइया बना तैराते,
नदी नाले के पानी में।
हाय ओ बचपन बीत गया,
बस याद बचा यूं ध्यानी में।।
अब उ सब बचपन कब लउटी कारुष पता नही आवन।
सोच सोच करता हूं ••••••••••••••••।
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कलम से✍️
कमलेश कुमार कारुष
मिर्जापुर
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