ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

मुहब्बत-प्रतिभा पाण्डेय "प्रति" चेन्नई

शीर्षक:-मुहब्बत


मुहब्बत तो मुहब्बत ही होती है 
जब कभी होती है, शिद्दत से होती है,
पर वो कमाल की होती है 
जो मुकद्दर में नहीं होती है ।

ताउम्र एक अजीज सी चुभन ,
कुछ पाया कुछ बाक़ी मिलन,
एहसास मिटा न पाये कभी
 दिल दुआएं, मन्नतें करता,
काश मिल जाती मंज़िल ।

नज़रिये की नज़र उतार देते,
अपनी तस्वीर उसकी नज़रों में देखी थी,
ख्वाब पूरा करने को उद्धत मन,
जो ख्वाब तुम्हारे मेरी आँखों में देखी थी।

खोकर कुछ अपना हिस्सेदार बन जाता है मजबूरी 
चुभन और बढ़ जाती जब हो जाती है दूरी
वाह कब आह में बदल जाती है 
चाह कठिन राह में बदल जाती है 
देखते हैं नैन, चैन अपना जाते हुए
अश्क के समन्दर में गोते लगाते हुए,
दर्द बहुत होता है सहा नहीं जाता 
तब दिमाग़ कहता काश प्यार नहीं होता.....!

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प्रतिभा पाण्डेय "प्रति"
चेन्नई
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