शीर्षक:- तुम
मंजर में हो मेरे ,
पर बयां किससे करूँ !
रूह में रहने की जगह बना ली है तुमने,
तेरी रूह में कैसे मैं प्रवेश करूँ !
न जाने क्यूँ कुछ लोग अपने से लगने लगते हैं,
सपना होकर भी हकीकत से दिखते हैं!
बार-बार मुड़-मुड़ कर देखती हूँ ,
बारम्बार पिक्चर निहारती हूँ !
गलतफहमियां क्यूँ पाल रखे हो जनाब ,
हमें साधारण पहचान मे डाल रखे हो जनाब !
कभी करीब आओ तो बताएं ,
अपनी पुरानी दास्ता सुनाए....!
समय ने मेरे घाव को भार दिया है,
पुरानी यादों पर नाकाब चढ़ा दिया है !
अपनो का गम और समन्दर का मम(पानी)
कभी कम नहीं होता,
पर समय से बलवान भी तो कोई नहीं होता ।
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प्रतिभा पाण्डेय "प्रति"
चेन्नई
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