शीर्षक:-वीरों की मस्ती
दोनों माँ का दिल तेजी से घबराया होगा ,
न जाने कितनी घुटन महसूस, वो पल कराया होगा !
साँसे कभी तेज, तो कभी रुकने को उद्धत हुई होगी ,
जब तीनों लाल को फाँसी पर चढ़ाया होगा !!
1931 की गहरी शाम, धोखा से हुआ काम तमाम,
'इंकलाब जिन्दाबाद' 'साम्राज्यवाद मुर्दाबाद' की गूँज
आखिरी तक होता रहा !
फाँसी की कोठरी जैसे हो सुखांतकी चलचित्र ,
वीर भगत हँसता रहा !!
शहिद- ए-आजम अपनी आवाज़ बुलंद करके ,
अंग्रेजी सरकार से लड़ते रहे !
विरोध पूँजीपतियों से भी था ,
जो मजदूरों को प्रताड़ित करते रहे !!
गहरी से भी गहरी थी सोच ,
तीनों वीर शहादत के समय, खेल रहे थे सिपाही चोर!
पहले मैं जाऊँगा,नहीं पहले मैं, अरे! मैं ,
पहली बार, मरण के संवाद ने मोह लिया था ओर-छोर!!
हुकुमत सरकार अचम्भित ,
मर मिटने को तैयार ये कैसी मस्ती हैं !
अल्हड़, सुकोमल, वीर, मदमस्त, यश के अमर धरोहर....,,
अरे! ये माँ का आँचल बचाने वाले दीवानों की हस्ती हैं !!
जाँबाजों के हौसले ने पूरा साम्राज्य हिला दिया ,
'आजादी.. आजादी..' की आवाज और बुलंद करा दिया !
हर शक्स का हृदय, जोश से भर गया ,
घर बार छोड़ ,कूच कर गया !!
क्रांतिकारियों का खौफ लाॅर्ड इरविन को हिला डाला ,
कल की मौत का फरमान, आज में तब्दील करा डाला !
भय जिनसे भयभीत, ऐसा था वीरों का विशाल टोला ,
शहीद वीर गा रहें, आज पहन वसंती चोला !!
मेरी बेड़ियों का स्वर अब हमेशा गूँजता रहेगा ,
मैं तो जा रहा हूँ , पर ये सिलसिला ना रुकेगा !
एक को मारोगे, दूसरा फिर खड़ा हो जायेगा ,
भारत माँ के रक्षक, आन बान शान हर इंसान बचायेगा !!
सीना चौड़ा करके माँ से बस एक शपथ माँगी ,
ना आना लेने शव और न आने देना आँखों में पानी !
भेज देना छोटे को, वीर 'वीर' को देख कमजोर न पड़ पायेगा ,
मेरे शव को देख गर रोई तू माँ, मेरा बलिदान व्यर्थ चला जायेगा !!
सो गये धरती के लाल, ओढे केसरिया आँचल ,
ऐसे रोई माँ भारती, जैसे बरसे काला बादल !
अमर धरोहर सींच रक्त से, आजादी का उपवन महकाना,
धरती पुत्र हो तुम, तन मन धन से जनमंगल बरसाना ।
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प्रतिभा पाण्डेय "प्रति"
चेन्नई
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