ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

आखिरी दौर-प्रतिभा पाण्डेय "प्रति" चेन्नई

शीर्षक:- आखिरी दौर

काश,
जितना महसूस करते हो तुम,
कह पाते,
मेरे सामने शब्दों का अस्तित्व रख पाते !
मौन मैं रहती,
और तुम सब बातों को समझ पाते,
एहसास मेरे दिल की सुन पाते ,
काश, मुहब्बत को, 
दो चार शब्दों में बयॉ कर पाते ।

परखने की अदा तेरी,
बार-बार की जद(चोट) तेरी ।
आहट तक नहीं ,
कैसे अंदर तक टूट गये.....,
अरमानों के बादल घिर-घिर रूठ गये !

चलो अब एक काम करते हैं ,
जितना समय दिया,
तुमसे मांग लेते हैं ------
क्या वापस कर पाओगे ?
बेवजह जो तेरे हो गये हैं ?
वजूद मेरा दे पाओगे ????

खत्म कभी कुछ नहीं होता,
मीठा दर्द से शुरू इश्क,
 तीखा, अतलस्पर्शी गम देता, 
पर बस,
सब भुलाने की जिद पर अड़े रहते हैं !

आखिरी दौर तक,
 यादों का सिलसिला चलता है,
बस जाहिर करना छोड़ देते हैं ,
क्रोध पर आवरण, मौन चिकित्सक का ओढ़ लेते है |

प्रतिभा पाण्डेय "प्रति"
चेन्नई

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