शीर्षक:- आखिरी दौर

काश,
जितना महसूस करते हो तुम,
कह पाते,
मेरे सामने शब्दों का अस्तित्व रख पाते !
मौन मैं रहती,
और तुम सब बातों को समझ पाते,
एहसास मेरे दिल की सुन पाते ,
काश, मुहब्बत को,
दो चार शब्दों में बयॉ कर पाते ।
परखने की अदा तेरी,बार-बार की जद(चोट) तेरी ।आहट तक नहीं ,कैसे अंदर तक टूट गये.....,अरमानों के बादल घिर-घिर रूठ गये !
चलो अब एक काम करते हैं ,
जितना समय दिया,
तुमसे मांग लेते हैं ------
क्या वापस कर पाओगे ?
बेवजह जो तेरे हो गये हैं ?
वजूद मेरा दे पाओगे ????
खत्म कभी कुछ नहीं होता,मीठा दर्द से शुरू इश्क,तीखा, अतलस्पर्शी गम देता,पर बस,सब भुलाने की जिद पर अड़े रहते हैं !
आखिरी दौर तक,
यादों का सिलसिला चलता है,
बस जाहिर करना छोड़ देते हैं ,
क्रोध पर आवरण, मौन चिकित्सक का ओढ़ लेते है |
प्रतिभा पाण्डेय "प्रति"
चेन्नई

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