ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

महर्षि दयानन्द -11-चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

🚩महर्षि दयानन्द -11

थकित, श्रमित बैलों को लख कर,
           गाड़ीवान को बहु विधि समझाया। 
गाड़ीवान था अति ही हठी निर्दयी,
            है साँझ ढल रही कह के भरमाया।।
ऋषिवर ने,फिर बैलों को अलग कर,
            लिया जुआठा अपने ही कन्धे पर। 
ब्रह्मचर्य का निज तेज दिखा कर,
           गमनशील कर गाड़ी ,लाये पथ पर।।
यह भी था उनका कृतित्व महान्, 
           सारा जगती करता जिससे सम्मान। 
उपमाओं का करके अवसान, 
             नरदेव रहा खुद अपना उपमान।।
पशुपालन व कृषि की संतरणी, 
              गौ का संवर्धन है भू-भव-तरणी।
तिथि विशेष में गौ पूँछ पकड़कर,
              मिथ्या कथ्य,संतरण है वैतरणी।। 
वेद ज्ञान का कर अवैदिक कदर्थ, 
             कहते गौ-हनन का गौ-मेध तदर्थ। 
"गौ करुणा निधि" देकर ऋषि ने, 
             सद् अर्थ दिया रुक जाये अनर्थ।।
"वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति"कह,
            प्राणी हिंसा का करते अर्थ निरूपण। 
शब्दों का है अनुचित विश्लेषण, 
            अश्वमेध, नरमेध का पुष्टि विद्रूपण।।
वेद-ज्ञान का कर मिथ्या कर्षण, 
             था दर्शन का ही, हो रहा कुदर्शन। 
मति-भ्रष्टों की बहुहाट सजी थी, 
             कुविचारों का ही विपणन प्रदर्शन।।
आर्य ग्रन्थ औ'आरण्यक सभी, 
             पंक- अंक में मिल सिमट रहे थे ।
बल-विक्रम को विस्मृत करके, 
            "आर्य-कीर्ति"को तज भटक रहे थे।।
वेदार्थ-मर्म को कौन विचारे, 
               था नास्तिकी साम्राज्य छा रहा । 
वैदिक कर्म अरु वेदनिष्ठा पर, 
              चार्वाकी मत का अपघात हो रहा।। 
माता कन्या भगिनी चंडालीचमारी, 
             से संगम करना,नग्नपूजना,पापाचार। 
मद्य,मांस,मच्छी,मुद्रा,मैथुन को, 
             है मुक्ती मार्ग, बताते थे पंच मकार।।

 क्रमशः12✍️
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

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