ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

भगवा चंद्रगुप्त वर्मा आकिंचन

~🚩🚩🚩~~  " भगवा "~~~🚩🚩🚩~
रंग नहींं है केवल भगवा, केशर रंग उड़ाता भगवा, 
रंग बसंती चोला भगवा, राष्ट्र पुरोहित है ये भगवा। 
त्याग और बलिदानी भगवा,वीर शहीदी रंग है भगवा, 
माँ का बंधन खोला भगवा,देश धर्म उन्नायक भगवा।           
पावक रंग है धरता भगवा,अरि हिय को दहलाता भगवा,      
भारत भारती रक्षक है भगवा,रिपुओं का ये भक्षक भगवा।  
दुष्टों का यमराज है भगवा,संतो का धर्मराज है भगवा, 
धर्म-ध्वजा व मानबिन्दु ये भगवा ,राष्ट्रकाअभिमानहै भगवा।
अम्बर में लहराता भगवा, हरि का ये पीताम्बर भगवा,
हनु को उर बैठाता भगवा,अर्जुन रथ फहराता भगवा। 
ओम् ज्योति सम्पूरित भगवा,हिरण्यगर्भ है पावन भगवा, 
तापत्रयी हरता है भगवा, भक्तों का त्रिगुणायक भगवा।
यहीभवानी तलवार है भगवा,राणा काजयघोष है भगवा, 
 वरदायी  झनकार है भगवा ,चौहानी  टनकारहै भगवा।
 बंदति मातृभूमि ये भगवा,राष्ट्र भक्त हरसावें लख भगवा,      आर्यों का अभिमान है भगवा,आर्यभूमि आदर्श है भगवा।
भ संज्ञित उर्जा पुंज है भगवा,ग प्रत्यय गमनशील है भगवा, 
भग संयुत भगवान है भगवा, वा युत हो वरणीय है भगवा। 
भव भय भंजन करता भगवा,भव का पोषण करता भगवा, 
ऋषियों का प्रतिपोष्य है भगवा,देशधर्म प्रतिमान है भगवा।
रश्मि रथी आते उदयांचल, उर्मिल ऊषा झलकाते भगवा ,    केशर -अबीर से पवनदेव भी, नील गगन को रंगते भगवा। 
तरुशिखा पर छाती है केशर,स्वर्णमयी हो जाती है भगवा ,
अस्ताचल दिशि को जाते दिनकर, से सादर सहजाती भगवा।     
"जयति जय हो,जय हो भगवा ,जय हो, जय हो,जय हो भगवा"       
✍️ चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन " गोरखपुर
              

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