🚩महर्षि दयानन्द-13
स्वामी सर्वदानन्द जी वीतराग थे,
थे त्यागी,योगी, व तपी,तपस्वी।
परमार्थ के वे जीवन्त मूर्ति थे,
परम श्रेष्ठ व मुर्धन्य ओजस्वी ।।
स्वतंत्रानन्द स्वामीजी भी थे,
सरस्वती के वरद पुत्र व अवतारी।
साहसी,कटुवक्ता,अपरिग्रहीसन्यासी,
जग होता था जिनका बलिहारी।।
स्वामी दर्शनानन्द,दीक्षित सन्यासी,
थे कर्म-योग के दृढ़ विश्वासी ।
पाँच गुरुकुलों के थे न्यासी,
250 ट्रैक्ट के लेखक अनुरागी।।
आनन्द स्वामी थे धर्म प्रणेता,
आर्य जगत के,थे प्राण व नेता।
हैदराबाद के रण के थे वे होता,
थे सत्याग्रह के संग्राम-विजेता।।
रत्न - श्रेष्ठ नारायण स्वामी थे,
ऋषि के भक्त व धर्म धुरन्धर।
हैदराबाद के सत्याग्रह में,
नामित थे वे, संग्राम-पुरन्दर।।
महान् आत्मा हंसराज थे,
त्याग व तपस्या के प्रतिरूप।
अवैतनिक आचार्य, प्रचारक,
ऋषि के आदर्शों के अनुरूप।।
लाला लाजपत राय के अन्दर,
अनल भरा था उर-अभ्यन्तर।
लक्ष्य अटल था भाव प्रबल था,
क्रांति-वीर था, वह अभ्यंकर।।
विद्यार्थी गुरुदत्त थे पंडित मुनिवर,
वैराग्यव्रती,आर्यमनीषी औ'धीमान्।
ऋषि के चरणों का रज पाकर ही,
नास्तिक से थे बनेआस्तिक महान।।
अप्रत्यासित,यात्रा करके ऋषिवर,
जब जोधपुर के राज्य को आये।
ऋषि का भक्त था राजनरेश वह,
राज-धर्म को बहु विधि समझाये।।
सुन रखा था राजन् के प्रति यह,
कि वह है,शील-धर्म से भटक रहा।
राज-नर्तकी नन्हीं वेश्या पर वह,
है आसक्ति युक्त हो अटक रहा।।
क्रमशः14
✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"

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