ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

महर्षि दयानन्द -14-चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा"अकिंचन",गोरखपुर

🚩महर्षि दयानन्द -14

अनुताड़ित व अनुप्रेरित करके, 
          व्यथित हृदय से बोले ऋषिवर। 
"नर केहरी"की संगिनी हो स्वानी,
           क्या उचित यही है, भक्त प्रवर।।

वह गन्धर्वी फिर बनी सर्पिणी,
           बैरिन ने बिष प्रबंथित करवाया। 
जगन्नाथ पंडित से मिल करके,
         भोजन सामग्री में विष डलवाया।।

पूर्व प्रयासों को योगी श्रेष्ठ ने,था
         नौलि क्रिया से निष्कीर्ण कर दिया। 
पिसा काँच था ,इस अभ्यन्तर में, 
         चुभकर आँतो को विदीर्ण कर दिया।।

'गत होता,''हरआगत' है जग में, 
          कह विष दाता को अभय दे दिया। 
तेरी इच्छा पूर्ण हो भगवन कह, 
          दैहिक पीड़ा को शांत कर लिया।।

मार्ग दिखाया जो लीलाधर ने,
            जगती ने ,वह अनुसरण किया। 
संवरण इह लीला को करके, 
           "'अज-मेरू"धाम का वरण किया।। 

 गुरू के चरणों में, जिसने अपना सर्वस्व लुटा, 
गुरू के आज्ञा को अपने माथे का सिंदूर किया। 
जिसने मानव को,मानवता का शुचि रूप दिया, 
और वसुन्धरा को भी नूतन भव्य स्वरूप दिया।।

सन्अट्ठारहसौ तिरआसी,तीसअक्टूबर मास का पल,
जग स्नेहिल कर रहा वर्तिका उज्वल करने भूअंचल।
दीपावली के आवर्तन में नियति नटी ने रचा परिवर्तन,
नवप्रभात की आशादेकर रश्मिरथीभी चलादिगंचल।।

                                          🚩🙏🚩
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        जो बोले सो अभय वैदिक धर्म की जय
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  ✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा"अकिंचन",गोरखपुर 

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