वैदिक विचार व कर्म
🚩वै.वि.व कर्म-9
काली चन्द राय उर्फ काला पहाड़
बंगभूमि के मुस्लिम शासक की, इक प्राणप्रिया एकल बेटी थी।
रुपमती वह परम सुशीला कन्या ,पर निश्चय की परम हठी थी ।।
ब्राम्हण श्रेष्ठ को दिल वह दे बैठी,जो उसका ही सेनानायक था।
पराक्रमी वह परम् ओजस्वी युवक ,तेजस्वी तन से पावक था।।
राजकोट के छज्जे पर बैठी,वो निरखा करती छबि आती जाती।
गंगा स्नान,नित्य कर्म को जाते,विप्र कुमार से कुछ कह ना पाती।।
रुग्ण हो गयी वह मुग्धा रुपसि,उर की पीड़ा छिपा,ना कह पाती।
राज्य वैद्य व गुनी प्रवीना तंत्री,भूल गये सब निजज्ञान की थाती।।
बासन्ती काया पर पतझड़ छाया,था सूख-सूख करके मुरझाया।
अनभिज्ञ रहे अन्तर्कथा से, मात पिता को कुछ समझ न आया।।
राज्य रियासत,धन दौलत अपने,न्योछावर कर देने को तत्पर थे।
शहजादी जीवन रक्षण हित,वे सब कुछ देने करने को उद्यत थे।।
प्रिय सहेली ने अपना मुँह खोला, राज बता माँ का हिय तौला।
मर्म जान के हिय अंतस डोला,अब राह दिखावे मुझको मौला।।
आनन फानन फरमान हुआ,पूरा करने को पुत्री अरमान हुआ।
गयै बुलाये सेनानायक को, तब सब तथ्यों का कटुभान हुआ।।
कर लो निकाह, पढ़ लो कलमा,था यह वैवाहिक प्रस्ताव किया।
राजपाट भी ले लो आधा मुझसे,कहके सुन्दरतम् उत्कोच दिया।।
निर्लिप्त रहे ,निर्मल मन को, तब धर्म मार्ग का यह आया व्याधा।
निज आस्था धर्म को मैं क्यों त्यागूँ, सम्पूर्ण राज्य दें याकिआधा।।
राजभक्त हूँ हे राजन!यदि कह दें,निज प्राणों का मैं उत्कर्ष करूँ। धर्म निष्ठ हूँ, मैं धर्म का पालक, तज धर्म को कैसे अपकर्ष करूँ।।
धर्म तजो मत निज धर्मब्रती तुम,पर कन्या को मेरे तुम अपनाओ।
राह तुम्हें जो भी अति रुचिकर हो, वही मार्ग मुझको बतलाओ।।
🚩वै.वि.व कर्म -10
चन्द माह का लेकर अवसर वह,धर्मनिष्ठ काशी धाम को आया।
माँगा उसने आकर धर्म व्यवस्था,यवनी को कैसे जाये अपनाया।।
रक्त शुद्धता और श्रेष्ठता,ही शास्त्रोचित है पालन करना कह कर।
भ्रमित किये ब्राम्हण कुमार को,प्रतिकूल व्यवस्था अवैदिक देकर।।
साबुन पानी करने से बोलो क्या, गर्दभी है पुनि घोड़ी हो जाती।
नस्ल बदल जाती है क्या उसकी,द्रुति गति,क्या शुद्धी हो जाती।।
ब्रत उपासना अरु पूजा अर्चन कर,विश्वनाथ मंदिर में ठहर कर।
भोलेनाथ से पुनि स्तुतिआराधन कर,कश्मीर चला पाने रहवर।।
कश्मीरी पंडित थे अति विद्वान,जनमानस में मान्य पूज्य महान।
कहीं व्यवस्था दे ना बैठें वे सब,काशी व्यवस्था से हो अनजान।।
काशी के सब पंडित मिलकर,विकट चक्रव्यूह की संरचना कर।
धावक से उन्हें सन्देश भिजवाये,नयी व्यवस्था से वर्जित कर।।
फिर हुआ वही जो कुछ होना है,नियति नटी का नित रोना है।
राह पड़े हर पीत धातु को,कह दोगे क्या कि यह कुंदनसोना है।।
शुद्धिकरण से असहमति पाकर,प्रवंचनापूर्ण छद्म व्यवस्था से।
व्यथित हृदय से निजगृह को लौटा,मंथन करता निज आस्था से।।
तुम निश्चय करके क्या हो लोटे,यह यक्ष प्रश्न होगा हीअभ्यन्तर?
होगा विवाह या कि निकाह,इस गूढ़प्रश्न का मैं क्या दूँगा उत्तर।।
जब राजाज्ञा से राजमहल में,आदेशित होकर वह गया बुलाया।
बतलाओ क्या है अब इच्छा मन की,यह शाही प्रश्न गया दुहराया।।
असमंजस तोड़ वो बोला निर्भय,ना होगा निकाह,ना ही विवाह।
धर्म त्याग करने से है अच्छा,जा जंगल में करलूँ अपना निर्वाह ।।
सुन कुपित हो गया बादशाह तब क्रोधित होकर चित्कार किया ।
तुम पाखण्डी अरु दम्भी हो पामर,ना मुराद हो, अपकार किया।।
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✍️
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "
गोरखपुर।
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