वैदिक विचार व कर्म
🚩वै.वि.व कर्म-11
इस काफिर को लटका दो फाँसी, सरेआम राजमार्ग के चौराहे पर।
इन्सानी इसमें रुह नहीं, पथभ्रष्टी है, कुफ्री ,चलता ये कुराहे पर।।
शहजादी सुनकर यह घबरायी, रक्षण हित जब राह ना पायी।कुर्बान करूँगी खुद को में,एकल मार्ग यही उसने अपनायी।।
पहुँची फाँसी स्थल पर शहजादी,मुल्जिम हूँ मैं वह चिल्लायी।
देदो मुझको फाँसी तुम पहले,फिर देना इसको, कह लिपटायी।।
चमत्कार हुआ तब उस निष्ठुर मन में,स्फुरण हुआ उसके तन में।
उसके उर ने तब यह समझाया,मिल जाओ तुम इन प्रेमी जन में।।
काली चन्द राय नहीं रहा अब हिन्दू नव मुस्लिम कहलाऊँगा।
राह खुले हों हर मानव हित में ,वह मजहब मैं अपनाऊँगा ।।
अंगीकार करूँगा यवनी को,जिसने खुद को ही कुर्बान किया।
महमूद फरमूली नामित होकर, पूरा उसका अरमान किया।।
नव अवतार हुआ था उसका,काशी पर पहला आघात किया। मथुरा से फिर सोमनाथ तक, सारे मंदिर वह ध्वस्त किया।।
प्रलयंकर आक्रांता बनकर, वो काला पहाड़ उपनाम लिया।
उत्तर भारत में काली आँधी बनकर,मर्दित सारा सम्मान किया।।
ऊँच-नींच व जाति व्यवस्था, वैवाहिक सम्बन्धों का प्रतिबंधन।
वैदिक विचारों के समाज में,छाया रहा छूतअछूत का भुजबंधन।। वर्गीकृत कर इस श्रेष्ठ समाज को,कुंठित कर जर्जरित बनाया।
भ्रातृत्व भाव, शुद्धिकरण को तजना,मातृभूमि को दास बनाया।।
हम अतीत से शिक्षा लेकर,पुनि पावन आर्यपथ को ही अपनायें।
ऊँच-नीच,अपावन भाव कुटिल तज, बन्धु प्रेम समरसता फैलाये।।
अभ्यूदय हो,आर्यजाति का इस जगती में, वैदिक धर्म सनातन फैले पुनि उन्नत होकर।
सुखसमृद्धि बढ़ावें,आर्यसंतान विज्ञानपुरंदर, वर्द्धन हो शुचि विद्या का,शिल्पज्ञान निरंतर।।
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✍️
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "
गोरखपुर।
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