ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

वैदिक विचार व कर्म-7&8-चन्द्रगुप्त वर्मा अकिंचन

वैदिक विचार व कर्म

🚩वै. वि. व कर्म-7

विष्णु गुप्त के पंचतंत्र में, 'कूपमण्डूक' की कथा है  आता ।       
विराने में एक कूप पड़ा था, मण्डूक जहां रहते कुल भ्राता ।।
उदयांचल तो बस वही कूप था,अस्तांचल भी बस वही कूप था ।
उनका तो एक संसार वही था, बस एक राज्य व एक भूप था ।।

बड़े एक पोखर का मेंढक, था जलप्लावन में बह कर आया । 
नियति में उसके वही कूप था, जो अनजाने में कूद समाया ।।
भयभीत हुए  कुयें के सब वासी, सिमट गये सब एक ओर । 
आकाश मार्ग से कौन है आया,अरू क्या है इसका ओर छोर ।।

अग्रज को अपने आगे कर, आये सन्निकट पुनि साहस कर । 
भगवन हैं, किस लोक से आये, अभय दें हमको आलोकित कर ।।
कहते मुझको हैं गोपाली मेंढक, मैं योनिज भ्राता हूँ , तव मण्डूक ।
परिजन सभी पोखर में हैं रहते,मैं ही आयाबहकर बन  कन्दूक।।

पास का पोखर आवास है मेरा, निज गृह धरती,नहीं है अम्बर । 
एक वंश कुल जाति है अपना, समझें मुझको आप सहोदर ।।
प्यारा सा एक छलाँग लगा कर, पूछा जब एक शिशु अज्ञान । 
त्रिज्या, फिर अर्धवृत बना कर, उछला युवा, बन कर संज्ञान ।।

पूरे कूएँ का पुनि वृत्त बना कर, अति विस्मय के भाव जता कर । 
क्या पोखर इससे भी बढ़ कर, पूछा अतिशय क्रोध में आकर ।।
पोखर तो एक अनुपम घर है, इस कूप से भी, बढ़ कर पयधर है । 
पोखर है एक वृहद जलाशय,अति जल का धारक जलधर है ।।

कूएं का,एक अति वृद्ध अधिवासी,बोल उठा सुन कुटिल प्रवासी।
अतिरंजित है कथा प्रलापी,हम सब सपनों के ना हैं अभिलाषी।। 
पुरखों दर पुरखों से हमनें, सुना नहीं अतिरेकी ऐसा आख्यान ।
छलो नहीं तुम ऐ बहुरुपिये, बन्द करो अब निज व्याख्यान ।।

नवल चेतना से वंचित रह कर,है अज्ञानी करता अपना अपकर्ष।
कूपमंडूकी सा आत्ममंथन हीन, ठुकराता रहता अपना उत्कर्ष ।।

🚩वै.वि.व कर्म-8

मठ मंदिर व आश्रमधाम थे,ज्ञानोपासना के धर्मकेंद्र।
राष्ट्र -भक्ति के उन्नायक थे, जो पैदा करते थे मानवेंद्र।।
सर्वांग-शुचिता थी जब तक,सभ्यता,संस्कृति के थे वाहक। 
विश्वगुरु भारत कहलाता,वेद ज्ञान का रश्मि -संवाहक।।

धर्म शील मय ,कला सभ्यता,ज्ञान क्षेत्र का चरमोत्कर्ष। 
ओऽम् ध्वजा बताता मानबिंदुआर्यसंस्कृति का था उत्कर्ष।। 
नमस्कार नमस्ते या प्रणाम,अभिवादन करते वय अनुसार। 
गुरुजन को प्रणिपातभी करते,यथायोग्य हम समयानुसार।।

नमन हैं करते प्रेमपयोधि से,आत्मवत् सरीखे ससम्मान।
प्रवंचना से हम हैं बचते, ना कहते 'अपना पंथ महान'।।
कैसे मैं समभूमि पर सोऊं,जब भैया मेरे भूमि पर हैं सोते। 
गह्वर एक सुतल करवाकर,रामानुज भरत उसमें थे सोते।।

संवेदना की पराकाष्ठा का, कैसा था यह उच्च विचार । 
धरती क्या केवल भोग्या है?कहीं पलायन कर दो यार।। 
रजकणमें जिसके खेल बढ़े हैं,माटी जिसका माथे का चंदन। 
मातृभूमि की ना करना बंदन,यह कैसा 'मज़हब' का बंधन।।

मातृभूमि है स्वर्ग से उत्तम,पुरुषोत्तम करते थे अभिनन्दन । 
इस जननी पर हों नतमस्तक,शठता का तज अनुबंधन।।
प्रछन्न आस्तिक विकृत करते,छद्मवाणी से जग को हरते।
मेरा मत ही श्रेष्ठ बताकर,धरती पर हैं आतंक को रचते।।

शस्य श्यामला मातृभूमि के,रक्षण हित हम लेवें संकल्प।
राष्ट्र धर्म के बलिवेदी पर,प्राणोत्सर्ग करेंगें तज विकल्प।।

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✍️
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "
गोरखपुर।
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