ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

🚩स्वामी दयानन्द-6-चंद्रगुप्त वर्मा अकिँचन

🚩स्वामी दयानन्द-6

सदगुरु पाने का अभिलाषी, 
      भारत भ्रमण चला सन्यासी।
हिम-गिरि के गुह-कंदर में, 
      भटक रहा था, ज्ञान पिपासी।।
सन् अट्ठारहसौ सात नवम्बर, 
       सुरभित था धरती औ'अम्बर।
सद्गुरु पाया मथुरा के अन्दर, 
       विरजानन्द के धाम पहुँचकर।।
चार वर्ष की सफल साधना, 
        उस साधक ने परिपूर्ण किया।
वेदोपनिषद् में पारंगत होकर,
         शिक्षा अपना सम्पूर्ण किया।।
सम्मुख पहुँचा वो प्रज्ञाचक्षु के, 
          गुरूवर मुझको आदेश करें।
है शिक्षा मेरी पूर्ण हुयी यदि, 
          तो देशाटन को प्रस्थान करें।।
मैं हूँ अकिंचन अर्पित करता, 
          ये चन्द लौंग स्वीकार करें ।
गुरु दण्डीस्वामी का आशीष पा,
        नव जीवन को साकार करें।।
गुरुदक्षिणा चुकाने गुरु का तुम, 
        पारंगत हो बस इतना ही लाये।
ज्ञानार्जन का मूल्य यही क्या ? 
       मुझको तो ये किंचित ना भाये।।
है नहीं चाहिये,तुच्छ भेंट यह,
        मत कृपणों सा व्यवहार करो।
आभार शब्द का कब मैं भूखा,
         अपने जीवन को दान करो ।। 
गुरु का वचन न मिथ्या होगा,
         है दयानन्द का जीवन अर्पित। 
आदेश करें जो निधि मैं लाऊँ, 
         गुरु चरणों में मैं करूँ समर्पित।।
विश्वमित्र ने कब था यह चाहा, 
         मुक्ता मणियों का आगार मिले। 
बस जन जन के मन,रमें राम,
        और त्रस्तों को प्राणाधार मिले।।
तुम जाओ जग में वेद ज्ञान ले, 
         आलोकित सब संसार करो ।
सिसक रही है,जो चेरी बनकर,
        उस भारत माँ का उद्धार करो।।

                 ✍️क्रमशः 7
                  चंद्रगुप्त वर्मा अकिँचन 

Post a Comment

0 Comments